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Ex:-8 हमारा पर्यावरण


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हमलोग इस Notes में Class10th  का Chapter 8 हमारा पर्यावरण (Our Environment) के बारे में अध्यन करेंगे। इस Notes को बहुत ही सरल भाषा हिंदी में बनाया गया है ,जिससे की आप आसानी से समझ सकते है। इस नोट्स में सभी महत्वपूर्ण टॉपिक को शामिल किया गया है जो आप जानना चाहते है।  

हमारा पर्यावरण

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पर्यावरण शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी भाषा के आवेरॉन शब्द से हुआ है जिसका अर्थ होता है घिरा हुआ वास स्थान।
पर्यावरण सामाजिक ,आर्थिक ,राजनैतिक,भौतिक ,रासायनिक आदि तत्वों का मिला जुला रूप है जो अपने वास स्थान का निर्माण खुद करता है।
*जैव मंडल :-जिस बिंदु पर जलमंडल,वायुमंडल ,तथा स्थल मंडल मिलते है तो उनके मिलन बिंदु को जैवमंडल कहा जाता है।
पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem)
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पारिस्थितिक का प्रयोग टेन्सले नामक वैज्ञानिक के द्वारा सर्वप्रथम 1935ई० में किया गया है।
पारिस्थितिक जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसमे जीव जंतु एवं पेड़-पौधे के बीच पारस्परिक सबंधो का अध्यन किया जाता है।
पारिस्थितिक तंत्र दो घटक है।
1. अजैविक घटक
2. जैविक घटक
1. अजैविक घटक :-अजैविक घटक के अंतर्गत निर्जीव प्राणियों को रखा गया है ,जिसमे जीवन नहीं होते है।
अजैविक घटक को तीन भागों में बाँटा जा सकता है :-
(i)भौतिक वातावरण :-इसमें जल ,वायु तथा मृदा शामिल है।
(ii)पोषण :-इसमें विभिन्न कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ शामिल है।
(iii)जलवायु :-तापक्रम ,सूर्य की रोशनी ,आद्रता ,दाब इत्यादि  मिलकर जलवायु का निर्माण करते है। 
2. जैविक घटक:-जैविक घटक के अंतर्गत सजीव प्राणियों को रखा गया है,जिसमे सजीव के सारे लक्षण मौजूद होते है।
 जैविक घटक को तीन भागों में बाँटा गया है।
(1)उत्पादक (Producers)
(2)उपभोक्ता (Consumers)
(3)अपघटक (Decomposers)
(1)उत्पादक :-उत्पादक उसे कहते है जो भोज्य पदार्थ का संश्लेषण अपने कोशिकाओं के द्वारा करता है,उत्पादक कहलाता है।
*उत्पादक की विशेषता :-
(i)ये स्वपोषी होते है।
(ii)इसमें क्लोरोफिल पाया जाता है जिसके कारण ये प्रकाशसंश्लेषण होते है।
(iii)ये वायुमंडल में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड के बीच संतुलन बनाए रखता है।
(iv)ये मिट्टी से प्रमुख तत्वों को अवशोषित करने में समर्थ है।

(2)उपभोक्ता:-उत्पादक द्वारा तैयार किये गए भोज्य पदार्थो का ग्रहण कर अपना जीवकोपार्जन करता है ,उपभोक्ता कहलाता है।
 उपभोक्ता को तीन भागों में बाँटा गया है
(i)प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumers)
(ii)द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumers)
(iii)तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumers)

(i)प्राथमिक उपभोक्ता:-प्राथमिक उपभोक्ता में शाकाहारियों को रखा गया है जो पूरी तरह उत्पादक पर निर्भर है।
जैसे :-बकरी ,खरगोश ,हिरण ,ग्रासहॉपर आदि
(ii)द्वितीयक उपभोक्ता:-द्वितीयक उपभोक्ता के अंतर्गत छोटे मांसाहारी को रखा गया है जो प्राथमिक उपभोक्ता का अहार बनाकर अपना जीवकोपार्जन करता है।
जैसे :-लोमड़ी ,मेढ़क ,सियार आदि
(iii)तृतीयक उपभोक्ता:-इसके अंतर्गत वे जिव आते है ,जो प्राथमिक एवं द्वितीय दोनों उपभोक्ताओं का अहार बनाकर अपना जीवकोपार्जन करता है तृतीयक उपभोक्ता कहलाता है।
जैसे :-मनुष्य ,बाघ ,बाज आदि
(3)अपघटक :-इसके अंतर्गत सूक्ष्म जीवों को रखा गया है जो मरे हुए जीव जन्तु के शरीर को सरल व छोटे-छोटे अणुओं में अपघटित कर देता है ,अपघटक कहलाता है।
जैसे :-बैक्टीरिया ,कवक ,प्रोटोजोआ
*अपमार्जक :-वैसा जीव जो मरे हुए जीव जन्तु के शरीर का भक्षण कर अपना जीवकोपार्जन करता है ,अपमार्जक कहलाता है।
जैसे :-चील ,कौआ ,सियार
जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव ,सैप्रोट्रॉफ या सूक्ष्मउपभोक्ता कहलाते है।
*आहार श्रृंखला(Food Chain) :-ये पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का एकपथिय प्रवाह उसमे स्थित श्रृंखलाबद्ध तरीके से जुड़े जीवों के द्वारा होता है। जीवों को इस श्रृंखला को आहार श्रृंखला कहते है।
जैसे :-
घास के मैदान का आहार श्रृंखला :-
हरे पेड़-पौधे खरगोश सियार बाघ
तालाब के आहार श्रृंखला :-
शैवाल छोटे-छोटे किट-पतंग छोटी मछली बड़ी मछली
*आहार जाल(Food web) :-पारिस्थितिकी तंत्र में समान्यतः एक साथ कई श्रृंखलाएँ पाई जाती है। ये आहार श्रृंखलाएँ हमेशा सीधी न होकर एक-दूसरे से आड़े-तिरछे जुड़कर एक जाल सा बनाती है आहार श्रृंखला के इस जाल को आहार जाल कहते है।
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खाद्य श्रृंखला का आहार जाल 

*पोषी स्तर(Trophic level) :-आहार श्रृंखला में कई स्तर होते है तथा हर स्तर पर भोजन का स्थानांतरण होता है। आहार श्रृंखला के इन्ही स्तरों को पोषी स्तर कहते है।
ये चार प्रकार के होते है।
(i)प्राथमिक (उत्पादक)हरे पेड़ पौधे
(ii)द्वितीय (शाकाहारी)बकरी ,खरगोश
(iii)तृतीयक (छोटे मांसाहारी)सियार ,कुत्ता
(iv)चतुर्थ(बड़े मांसाहारी)बाघ ,चील
*लिण्डमान का 10% नियम
आहार श्रृंखला के प्रत्येक पोषी स्तर पर कुल ऊर्जा के 10% ऊर्जा का ही स्थनान्तर आगे पोषी स्तर को हो पाता है तथा शेष 90% ऊर्जा का व्यवहार अपने कार्यो में कर पाता है। इस नियम का प्रतिपादन लिण्डमैन नामक वैज्ञानिक ने किया था इसीलिए इसे लिण्डमान का 10% नियम कहा जाता है।
*जैव आवर्धन(Biomagnification) :-जैव अनिम्ननिकरणीय पदार्थ को एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर में जाने पर उसकी सान्द्रता या मात्रा में वृद्धि होती है तो उसे जैव आवर्धन कहते है।
        शैवाल छोटे कीड़े  छोटी मछली  वगुला
*D.D.T -Dichloro diphenyl trichloroethane
  इसका खोज पोल मुलर के द्वारा 1939ई० में किया गया था।
*अपशिष्ट पदार्थ :-मनुष्य के उपयोग में नहीं आने वाली वस्तुए अपशिष्ट पदार्थ कहलाता है।
इसे दो वर्गो में बांटा गया है।
(i)जैव निम्नीकरणीय पदार्थ
(ii)जैव अनिम्नीकरणीय पदार्थ
(i)जैव निम्नीकरणीय पदार्थ :-वैसे अवांछित पदार्थ जिसे सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित किया जा सके तथा उसे दूसरे रूपों में बदला जा सके जैव निम्नीकरणीय पदार्थ कहलाता है।
जैसे :-कागज ,जीव जंतुओं के मल मूत्र, इत्यादि
(ii)जैव अनिम्नीकरणीय पदार्थ :-वैसे अवांछनीय पदार्थ जिसे सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटन नहीं किया जा सके तो जैव अनिम्नीकरणीय पदार्थ कहलाता है।
जैसे :-DDT ,शीशा ,पारा इत्यादि

ओज़ोन परत
ओजोन ऑक्सीजन का अपरूप है।जिसका संकेत O3 होता है। इसका विस्तार 32 से 64 Km की ऊंचाई तक है। यह एक गैसीय परत है जो सूर्य से आने वाली पराबैगनी किरणों को पृथ्वी पर सीधे आने से रोकती है। जिसके कारण इस किरण के दुष्प्रभाव से इस पृथ्वी पर निवास कर रहे जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे सुरक्षित रहता है। इसीलिए इसे प्राकृतिक के सुरक्षा का कवच भी कहा जाता है।
 लेकिन मानवीय क्रिया-कलापों के दुष्प्रभाव से दक्षिणी अंटार्टिका में छिद्र हो चूका है जिसके कारण इस किरण के प्रभाव से अंधापन ,चर्म कैंसर जैसी बीमारियां फ़ैल रही है। साथ ही साथ पृथ्वी का तापमान भी बढ़ रहा है।
*ओजोन परत के प्रभावित करने वाली गैसें :-
 ⇨CFC,Co,CH4,No2,So2,Co2

*पराबैंगनी किरण(Ultravoilet Ray):-जिस किरण का तरंगदैर्य बैंगनी रंग के तरंगदैर्य से कम होता है तो उसे पराबैंगनी किरण कहते है।
*अवरक्त किरण :-जिस किरण का तरंगदैर्य  लाल रंग के तरंगदैर्य से अधिक होता है तो उसे अवरक्त किरण कहते है। 
*रेडियोधर्मी पदार्थ या रेडियोएक्टिव :-वैसा पदार्थ जिसके विखंडन के फलस्वरूप स्वतः ,β एवं у ऊर्जा की विपुल राशि उत्पन्न होती है ,तो उसे रेडियोधर्मी पदार्थ कहते है।
जैसे :-यूरेनियम ,बेरियम इत्यादि.
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